
चंडीगढ़, सतीश भारद्वाज : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ₹30 लाख की रिश्वत मांगने के गंभीर आरोपों में फंसे हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता जतिन सलवान की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति सुमीत गोयल की एकलपीठ ने पारित किया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब न्यायालय का अधिकारी माना जाने वाला कोई अधिवक्ता न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए अवैध धन की मांग करता है, तो यह न केवल एक आपराधिक कृत्य है बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और संस्थागत पवित्रता पर सीधा आघात है।
मिली जानकारी के अनुसार शिकायतकर्ता हरसिमरनजीत सिंह ने 13 अगस्त 2025 को सीबीआई को लिखित शिकायत दी थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपी अधिवक्ता ने बठिंडा की एक अदालत में लंबित तलाक मामले में फेवर में आदेश दिलाने के बदले ₹30 लाख की रिश्वत मांगी थी। आरोप है कि अधिवक्ता ने न्यायिक अधिकारी पर अपने प्रभाव का दावा करते हुए यह भरोसा दिलाया कि उसके माध्यम से फैसला मनचाहा कराया जा सकता है।सीबीआई ने शिकायत की सत्यता की जांच के बाद एफआईआर दर्ज की। जांच के दौरान फोन पर हुई बातचीत रिकॉर्ड की गई, जिसमें कथित रूप से रिश्वत की मांग की पुष्टि हुई। इसके बाद सीबीआई ने ट्रैप कार्रवाई की, जिसमें सह-आरोपी सतनाम सिंह के माध्यम से ₹4 लाख की राशि रिश्वत के रूप में स्वीकार की गई। इसी के आधार पर आरोपी अधिवक्ता को 14 अगस्त 2025 को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
जबकि बचाव पक्ष के वकील की ओर से दलील दी गई कि आरोपी कोई लोक सेवक नहीं है और कथित रकम को पेशेवर फीस के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपी लगभग 70 वर्ष का है और गंभीर हृदय रोग सहित अन्य बीमारियों से पीड़ित है। यह तर्क भी रखा गया कि जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, इसलिए आगे हिरासत की कोई आवश्यकता नहीं है।हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में अदालत को अत्यंत सतर्क और कठोर दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि भ्रष्टाचार न्याय, समानता और कानून के शासन की जड़ों को कमजोर करता है, विशेषकर तब जब न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी का लोक सेवक न होना उसे इस स्तर पर राहत देने का आधार नहीं बनता, क्योंकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम ऐसे हर व्यक्ति पर लागू होता है जो किसी लोक सेवक को प्रभावित करने के लिए अवैध लाभ प्राप्त करता है।
अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद ऑडियो बातचीत, सीबीआई की सत्यापन रिपोर्ट और ट्रैप कार्रवाई को प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मानते हुए कहा कि इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी की उम्र और पेशेवर प्रतिष्ठा आरोपों की गंभीरता को कम नहीं कर सकती, विशेष रूप से तब जब मामला न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास से जुड़ा हो। साथ ही यह तथ्य भी ध्यान में रखा गया कि आरोपी एक अन्य पुराने आपराधिक मामले में भी अभियुक्त रहा है।इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता और पीड़िता के प्रमुख गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद आरोपी नई जमानत याचिका दाखिल कर सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां मामले के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करेंगी और ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से कार्य करेगा।
हाई कोर्ट का यह आदेश उन वकीलों के लिए भी अहम है जो अधिकतर जिला अदालतों में भी अपने रसुख का दबाव बनाकर पीड़ितों के साथ ऐसे की काम गुपचुप तरीके से कर रहे हैं। जिनको पुलिस भ्रष्ट नेताओं के दबाव में आकर सभ्य लोगों पर फर्जी मामले दर्ज कर देते हैं। ऐसे अनेक मामले इन दिनों सुर्खियों में बने हुए हैं। जिस पर सरकार में बैठे उच्च अधिकारियों को कड़ा संज्ञान लेना चाहिए।

