गुरुग्राम, सतीश भारद्वाज : देश की सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा के जिला गुरुग्राम में एक चार साल की बच्ची के साथ हुए कथित यौन शोषण मामले में हरियाणा पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराज़गी जताई है। अदालत ने मामले में संवेदनहीनता और जांच में लापरवाही के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारी (IO) को पूरे रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है।
जानिए विस्तार से क्या था मामला, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराज की जाते हुए सख्त आदेश दिए हैं। जिसकी सुनवाई बीते सोमवार को चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने की थी।
अदालत की सख्त टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि:
“चार साल की बच्ची के मामले में इस तरह की असंवेदनशीलता अस्वीकार्य है।” पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे।
यह मामला गुरुग्राम के सेक्टर-53 थाना क्षेत्र का है, जहां एक नाबालिग बच्ची के साथ कथित तौर पर दो घरेलू सहायिकाओं और एक पुरुष सहयोगी द्वारा यौन शोषण किया गया। मामले में POCSO Act, 2012 की धारा 6 और 17 तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 65(2) के तहत FIR दर्ज की गई है।
पुलिस पर गंभीर आरोप : पीड़ित पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि,पुलिस ने 40 दिनों तक कोई गिरफ्तारी नहीं की, FIR दर्ज करने में भी काफी परेशान किया गया,महत्वपूर्ण सबूत जैसे CCTV फुटेज और फॉरेंसिक सैंपल सुरक्षित नहीं किए गए, बच्ची से बार-बार पूछताछ कर उसे मानसिक रूप से परेशान किया गया।
बच्ची के साथ अमानवीय व्यवहार किया अदालत को बताया गया कि:,बच्ची को मजिस्ट्रेट के सामने बयान से पहले 15–20 मिनट तक इंतजार कराया गया, उसे बार-बार “सच बोलो” कहा गया, जबकि वह इतनी छोटी है कि इन प्रक्रियाओं को समझ ही नहीं सकती थी। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने भी बिना माता-पिता की मौजूदगी के पूछताछ की गई। वही कोर्ट ने, माता-पिता के हलफनामे और मजिस्ट्रेट की टिप्पणियों को सीलबंद लिफाफे में रखने का आदेश दिया ताकि जांच की निष्पक्षता बनी रहे।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश:अदालत ने निर्देश दिया कि,पुलिस कमिश्नर और IO व्यक्तिगत रूप से पेश हों, वहीं महिला पुलिस अधिकारियों का विवरण दिया जाए,पुलिस स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करे। जांच CBI को सौंपने की मांगपीड़ित परिवार ने याचिका में मांग की है कि जांच को CBI जैसी स्वतंत्र एजेंसी कोई सौंपा जाए,लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो। वहीं यह मामला न केवल एक गंभीर अपराध को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि संवेदनशील मामलों में पुलिस और प्रशासन की लापरवाही किस तरह पीड़ितों के लिए अतिरिक्त पीड़ा का कारण बनती है। सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख न्याय प्रक्रिया में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च बुधवार को होगी।
अब इसमें देखना होगा कि गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर विकास अरोड़ा सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर जवाब दाखिल करते हैं या कोई बहाना बनाकर कोर्ट में पेश होने से अपना बचाव करते हैं।
बता दें कि पुलिस विभाग की लापरवाही का यह पहला ही मामला नहीं है, इससे पहले भी इस तरह के मामलों में गुड़गांव पुलिस ने मामलों में लीपा पोती कर पीड़ितों को न्याय से वंचित रखा है। जिसकी आवाज एक महिला वकील भी कई दफा पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में मेल द्वारा भेज चुकी है। वहीं ताजा मामला पुलिस थाना सैक्टर 10 का भी सुर्खियों में चल रहा है जिसमें पुलिस ने आरोपियों से मिली भगत करके कई आरोपियों को मुलजिम ही नहीं बनाया है,वहीं गुरुग्राम पुलिस ने यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चले जाने से खानापूर्ति करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर डिमांड पर लिया है।
