नई दिल्ली, सतीश कौशिक : गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर सिख जत्थों को पाकिस्तान जाने की अनुमति न देने के केन्द्र सरकार के निर्णय को लेकर राजनीतिक हलकों में आपत्ति जताई जा रही है। लेकिन इतिहास और वर्तमान सुरक्षा परिस्थितियों पर नजर डालें तो यह कदम न तो नया है और न ही किसी विशेष समुदाय के खिलाफ। यह निर्णय मुख्य रूप से श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया है।
### इतिहास से सबक
भारत पाक 1947 के विभाजन के बाद ननकाना साहिब, कर्तारपुर सहित कई पवित्र गुरुद्वारे पाकिस्तान में चले गए और लाखों सिख श्रद्धालुओं की पहुँच वहाँ तक लगभग असंभव हो गई। इसके बाद भी कई बार हालातों ने यात्राएँ रोकीं।
* 1965 के भारत–पाक युद्ध के बाद सीमापार यात्रा लगभग बंद हो गई।
* जून 2019 में सुरक्षा कारणों से 150 श्रद्धालुओं को अटारी सीमा पर रोका गया।
* कोविड महामारी के दौरान नवम्बर 2019 में शुरू हुआ कर्तारपुर कॉरिडोर 20 माह तक बंद रहा।
* मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद कॉरिडोर तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया गया।
* जून 2025 में गुरु अर्जन देव जी के शहीदी दिवस पर लाहौर जाने वाले जत्थे को अनुमति नहीं दी गई।
यह परंपरा स्पष्ट करती है कि जब भी राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा मंडराया है, सरकार ने तीर्थयात्राओं पर रोक लगाने में हिचक दिखाई नहीं है।
*पाकिस्तान का दोहरा रवैया बार बार सामने आया*
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान खुद को सिख धरोहर का संरक्षक बताता है, लेकिन वहाँ के अल्पसंख्यकों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता रहा है। मंदिरों को तोड़ा गया, जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएँ हुईं और गुरुद्वारों की उपेक्षा हुई। इतना ही नहीं, भारत से जाने वाले जत्थों को कई बार खालिस्तानी प्रचार का सामना भी करना पड़ा।
*दोनों देशों के मौजूदा हालात*
हाल के पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद हालात बेहद संवेदनशील हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को पाकिस्तान भेजना सरकार की नज़र में जोखिम भरा कदम हो सकता था। अधिकारियों का कहना है कि क्रिकेट मैचों की तुलना तीर्थयात्रा से नहीं की जा सकती, क्योंकि खिलाड़ी तो विशेष सुरक्षा घेरे में रहते हैं जबकि श्रद्धालु खुले और आसान निशाने बन सकते हैं।
*निष्कर्ष*
विश्लेषकों का मानना है कि यह पाबंदी किसी धार्मिक आस्था पर रोक नहीं, बल्कि सुरक्षा की जिम्मेदारी है। सिख समुदाय हमेशा से राष्ट्र के साथ खड़ा रहा है और जानता है कि राज्य का पहला कर्तव्य नागरिकों की रक्षा करना है। गुरुद्वारे हमेशा पवित्र रहेंगे, लेकिन नागरिकों का जीवन और राष्ट्र की अखंडता सर्वोपरि है।

