गुरुग्राम,सतीश भारद्वाज: गुरुग्राम की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने वर्ष 2017 में हुएं एक सड़क दुर्घटना मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पुलिस द्वारा बनाए गए आरोपी भारत को बरी किया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में असफल रहा, जिसके चलते आरोपी को संदेह का लाभ देकर बरी करना बनता है।यह मामला थाना DLF फेज-II में दर्ज FIR संख्या 522/2017 से संबंधित था। जोकि घटना 16 अगस्त 2017 की रात करीब 2 बजे की होने बताई गई थी,जब एक कार चालक ने कथित रूप से तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाते हुए मोटरसाइकिल सवार एक युवक करण को टक्कर मार दी थी। जिसके बाद घायल युवक को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था।
जिसपर स्थानीय पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 279 और 304-A के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।करीब 9 वषों तक चली लम्बी सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कई गवाह अदालत में पेश किए, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मौके के गवाह शिकायतकर्ता को अदालत में पेश नहीं किया जा सका। अदालत ने इस तथ्य को काफी गंभीरता से मानते हुए माना,कि अभियोजन पक्ष शिकायतकर्ता की गवाही नहीं करा सका,इसके अलावा जांच के दौरान कोई अन्य स्वतंत्र गवाह भी नहीं है और न ही घटना से संबंधित कोई ठोस भौतिक या तकनीकी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, जिससे अभियोजन पुरी तरफ साबित करने में विफल रहा है।
वहीं बचाव पक्ष के वकील जितेंद्र कौशिक ने दलील दी कि आरोपी की पहचान भी स्पष्ट रूप से यह साबित नहीं हो पाई की दुर्घटना के समय वही वाहन चला रहा था। अदालत ने भी पाया कि प्रारंभिक शिकायत में भी आरोपी का नाम नहीं था, जबकि पुलिस ने भी मामला एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ दर्ज किया गया था। बाद में पुलिस ने आरोपी को बिना पुख्ता सबूत के मामले में आरोपी बना दिया,जिससे संदेह और गहरा हो गया।अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वाहन तेज गति से चलाया जा रहा था, बल्कि यह भी साबित करना आवश्यक होता है कि वाहन चलाने का तरीका वास्तव में लापरवाही पूर्ण और खतरनाक था। इस मामले में सड़क की स्थिति, ट्रैफिक, वाहन की गति और दुर्घटना की परिस्थितियों से संबंधित कोई ठोस विवरण भी अदालत में प्रस्तुत नहीं किए गए। सभी तथ्यों और परिस्थितियों ,गवाह और सबुतो पर गौर करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष आरोपों को सिद्ध करने में असफल रहा है। आपराधिक कानून के सिद्धांतों के अनुसार,यदि किसी मामले में संदेह बना रहता है, तो उसका लाभ आरोपी को दिया जाना उचित है।
इसी आधार पर सीजेएम रजत वर्मा की अदालत ने आरोपी भारत को उक्त मामले में दोषमुक्त करते हुए बरी करने का आदेश दिया।करीब 9 वर्षों तक चले इस मामले में अंततः आरोपी को राहत मिली है। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की अहम भूमिका को उजागर करता है और यह भी दर्शाता है कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि उन्हें ठोस और विश्वसनीय प्रमाणों द्वारा सिद्ध न किया जाए।

