नई दिल्ली, सतीश भारद्वाज: सुप्रीम कोर्ट ने झूठी शिकायतों, मनगढ़ंत साक्ष्यों और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन पर रोक लगाने की मांग करने वाली जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है। यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पचोली शामिल थे, मामले की सुनवाई कर रही थी।
“समाज को संवेदनशील बनाना जरूरी”
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि झूठी शिकायतों की समस्या से निपटने के लिए समाज को अधिकारों के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कई बार शिकायतें वास्तविक शिकायतकर्ता की जानकारी के बिना भी दर्ज हो जाती हैं, फर्जी हस्ताक्षर आदि के माध्यम से, जिससे निर्दोष लोग प्रभावित होते हैं।
याचिका में निम्न प्रमुख मांगें की गई हैं:
देश के सभी सरकारी दफ्तरों थानों, न्यायालय परिसरों, पंचायत व नगर निकाय कार्यालयों तथा शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे डिस्प्ले बोर्ड लगाए जाएं जिनमें झूठी शिकायत, झूठे आरोप और झूठे साक्ष्य देने पर दंड के प्रावधानों का उल्लेख हो।
* एफआईआर दर्ज करने से पहले शिकायतकर्ता को झूठी शिकायत के दंडात्मक परिणामों से अवगत कराया जाए।*
शिकायतकर्ता से अनिवार्य शपथपत्र/अंडरटेकिंग ली जाए कि उसके आरोप सत्य हैं।
* झूठी शिकायत और झूठे साक्ष्य के मामलों में दी जाने वाली सजा को क्रमिक (consecutive) रूप से चलाने की घोषणा की जाए।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि BNS के अध्याय XIV में झूठे मामलों को दंडित करने के प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन इनके दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रशासनिक तंत्र विकसित नहीं किया गया है।
*कम सजा और विशेष कानूनों का हवाला याचिका में* एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि कुछ विशेष आपराधिक कानूनों में सजा की दर अपेक्षाकृत कम है और झूठी शिकायतें इसका एक कारण हो सकती हैं।
संदर्भित कानूनों में शामिल है: IPC की धारा 498A (अब निरस्त, पर मामलों का संदर्भ)* Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act* Dowry Prohibition Act* Protection of Children from Sexual Offences Act याचिका में कहा गया है कि झूठे मुकदमे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त अधिकारों—विशेषकर जीवन, स्वतंत्रता, गरिमा और त्वरित न्याय के अधिकार—का उल्लंघन करते हैं।
नंबी नारायणन मामले का उल्लेखयाचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले S. Nambi Narayanan v. Siby Mathews का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिष्ठा भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। उनका तर्क था कि किसी व्यक्ति के निर्दोष सिद्ध होने तक वर्षों बीत जाते हैं, जिससे उसकी सामाजिक व पेशेवर प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति होती है।
मामले का शीर्षक है:
**ASHWINI KUMAR UPADHYAY vs. UNION OF INDIA AND ORS | W.P.(C) No. 209/2026**।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी प्रतिवादियों से जवाब तलब करते हुए मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।-

