
गुरुग्राम, सतीश भारद्वाज : गुरुग्राम निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट हरेंद्र ढींगरा की द्वितीय अपील पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने अपील संख्या 43388) में RTI अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(h) के वर्षों से हो रहे दुरुपयोग पर निर्णायक और मिसाल कायम करने वाला ऐतिहासिक आदेश पारित किया है।आरटीआई का यह आदेश श्री ढींगरा द्वारा दायर उस RTI आवेदन में दिया गया है, जिसमें वरिष्ठ IFS अधिकारी विनय कुमार भार्गव के विरुद्ध मुनस्यारी, पिथौरागढ़ में तथाकथित इको-टूरिज्म/इको हट्स के निर्माण से जुड़े भ्रष्टाचार तथा वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के उल्लंघन पर की गई कार्रवाई की जानकारी मांगी गई थी। लोक सूचना अधिकारियों द्वारा सूचना देने से यह कहकर इनकार किया गया कि मामले में जांच लंबित है और सूचना देने से जांच प्रभावित होगी।
आयोग ने अभिलेखों के अवलोकन एवं सुनवाई के पश्चात अपने आदेश के पैरा 11 में एक ऐतिहासिक दिशा-निर्देश जारी किया।सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सूचना आयुक्त डीके आर्य ने अपने दिनांक 28-01-2026 के आदेश में दिए हैं,मुख्य निर्देश (पैरा 11):आयोग ने संबंधित विभाग को यह आदेश दिया है कि :जिन मामलों में जांच पूर्ण हो चुकी है, उनकी जांच का व्यापक निष्कर्ष (Broad Outcome) आदेश प्राप्ति के 15 दिनों के भीतर अपीलार्थी को उपलब्ध कराया जाए। जिन मामलों में जांच अभी गतिमान है, वहां जांच पूर्ण होने के 15 दिनों के भीतर उसका व्यापक निष्कर्ष अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराया जाए। यह आदेश ऐतिहासिक क्यों है?यह धारा 8(1)(h) के नाम पर की जा रही पूर्ण गोपनीयता की प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार करता है।यह स्पष्ट करता है कि लंबित जांच सूचना न देने का स्थायी बहाना नहीं हो सकती। यह स्थापित करता है कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि राज्य ने क्या कार्रवाई की, भले ही संपूर्ण फाइलें न दी जाएं।यह व्यक्तिगत सूचना और भ्रष्टाचार व वैधानिक उल्लंघनों में जन-जवाबदेही के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित करता है।
आयोग का यह आदेश RTI कानून की उस मूल भावना को पुनर्स्थापित करता है, जिसमें जवाबदेही को अपवाद नहीं बल्कि नियम माना गया है।राष्ट्रीय महत्वजहां देश भर में सार्वजनिक प्राधिकरण वर्षों तक RTI आवेदनों को धारा 8(1)(h) का हवाला देकर सूचना देने इन्कार करते रहे । वहीं उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग का यह आदेश RTI आवेदकों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और न्यायालयों के लिए एक प्रभावशाली मिसाल प्रस्तुत करता है और यह स्पष्ट संदेश देता है कि—पारदर्शिता न्याय में बाधक नहीं, बल्कि गोपनीयता भ्रष्टाचार की ढाल है।यह आदेश सूचना के अधिकार को पुनः उसके संवैधानिक उद्देश्य—पारदर्शी शासन और उत्तरदायी प्रशासन—की ओर ले जाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।

